Durg university B.sc( bio ) 1 yaer 2021 all subject answer

  1. गालजी बॉडी की संरचना एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।

Answer:- गॉल्जीकाय (Golgi Complex) कोशिका में कुछ विशेष प्रकार की क्रियाओं जैसे पॉलिसैकेराइड का संश्लेषण, कोशिकीय संश्लेषित पदार्थ (प्रोटीन) के भण्डारण, स्रावित होने वाले वेसिकल्स का निर्माण तथा कोशिकीय झिल्ली के विभेदीकरण के लिए कोशिकाद्रव्य में जटिल रचनाएँ होती हैं, जो गॉल्जीकाय होते हैं। E.R. के समान ये नलिकाकार तथा सेब के समान रचना होती है, जबकि ER के विपरीत ये समान्तर व्यवस्थित, चपटे तथा झिल्ली युक्त वेसिकल्स होते हैं, जिनके ऊपर राइबोसोम का अभाव होता है।

गॉल्जीकाय के बारे में केमिलो गॉल्जी ने सर्वप्रथम सन् 1898 में बताया था। गॉल्जीकाय प्रायः सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाते हैं। कुछ कोशिका जैसे-कवक कोशिका, ब्रायोफाइटा व टेरिडोफाइटा की शुक्राणु कोशिका, परिपक्व छन्तक नलिका, परिपक्व शुक्राणु व R.B.Cs. में उनका अभाव होता है। पौधों की कोशिका में इन्हें डिक्टिओसोम, जबकि जन्तु कोशिका में गॉल्जीकाय कहा जाता है।

संरचना (Structure) आकार एवं आकृति (Shape and Size) – विभिन्न कोशिकाओं में गॉल्जी कॉम्प्लेक्स की आकृति तथा आकार भिन्न-भिन्न होते हैं। यह आकृति कोशिकाओं की क्रियात्मक अवस्था पर निर्भर करती है।

परासंरचना (Ultrastructure ) प्राणी कोशिकाओं में गॉल्जी कॉम्प्लेक्स के तीन भिन्न घटक होते हैं (1) चपटे कोष या सिस्टर्नी (Flattened Sacs or Cisternae) – ये लम्बे नलिकाकार चपटे कोष हैं, जो चिकनी झिल्लियों के चट्टों के रूप में होते हैं। इनकी संख्या 4 से 10 तक हो सकती है। ये समान्तर रूप में स्थित होते हैं, प्रत्येक सिस्टर्नी थोड़ा वक्रीय (Curved) होता है। इसका उत्तल तल Forming face कहलाता है तथा अवतल तल Maturing face कहलाता है। प्रत्येक सिस्टन 200-300À चौड़े रिक्त स्थान से एक-दूसरे से पृथक् रहते हैं। प्रत्येक सिस्टर्नी दो झिल्लियों का बना होता है, जिनके बीच में लगभग 520Å की गुहा होती है। बाहरी झिल्ली लगभग 60Å मोटी होती है।

(2) गॉल्जीयन धानियाँ (Golgian Vacu oles)- ये बड़ी व गोलाकार धानियाँ हैं, जो गॉल्जी उपकरण के उपांत पर पाई जाती हैं। ये चपटे कोषों के विस्तार से बनती हैं। इनमें एक प्रकार का सघन या कणिकीय पदार्थ भरा रहता है।

(3) वेसिकल्स के समूह (Clusters of Vesi cles) – ये 60 व्यास के बिन्दुओं (Droplets) के समान वेसिकल्स होते हैं। इसका उत्तल तल form ing face से सम्बन्ध होता है। ये परस्पर जुड़कर छिद्रित रचना बना लेते हैं।

‘गॉल्जीकाय के कार्य (Functions of Golgibody)

(1) कोशिकीय स्त्रावण (Cellular Secretion) – गॉल्जी उपकरण विभिन्न प्रकार के स्राव जैसे हॉर्मोन्स, म्यूकस आदि के स्रावण में मदद करता है। अधिकांश स्त्राव प्रोटीन तथा कार्बोहाइड्रेट के संयोजन से निर्मित होते हैं अर्थात् ग्लाइकोप्रोटीन होते हैं। इनका प्रोटीन अंश राइबोसोम्स पर अमीनो अम्लों के संयोजन से होता है, ये प्रोटीन गॉल्जी में पहुँचते हैं, यहाँ इन पर कार्बोहाइड्रेट अंश भी जोड़ा जाता है। बाद में यह पदार्थ छोटे-छोटे वेसिकल्स में संगृहीत कर कोशिका की सतह पर जाकर कोशिका से बाहर स्थानान्तरित कर दिये जाते हैं, यहीं स्रावण क्रिया होती है।

(2) यौगिकों का अवशोषण एवं सान्द्रण (Absorption, Storage and Concentration of Com pounds) – गॉल्जी उपकरण संघनन झिल्लयों की भाँति कार्य करके कोशिका में भिन्न जगहों पर निर्मित पदार्थों में से जल अवशोषण कर उनकी सान्द्रता में वृद्धि करता है। ये पदार्थ लिपिड, पीतक, एन्जाइम्स, हॉर्मोन्स इत्यादि हैं।

(3) स्त्रावी वेसिकल्स का निर्माण (Formation of Secretory Vesicles) कणिकामय एण्डोप्लाज्यिक रेटिकुलम के ऊपर स्थित राइबोसोम्स प्रोटीन संश्लेषण करते हैं। ये प्रोटीन एण्डोप्लाज्यिक रेटिकुलम (E.R.) को ।

2. प्रतिरक्षा तंत्र की विभिन्न कोशिकाओं का विवरण दीजिए

उत्तर – शरीर के द्वारा किन्हीं विशिष्ट रोगाणुओं के लिए प्रतिरोध उत्पन्न करना या किसी रोग के प्रति प्रतिरोध करने के गुण को रोग-क्षमता या प्रतिरक्षण (Immunity) कहते हैं। प्राणियों को हमेशा बाहरी आक्रमणकारी फफूँद, जीवाणु, विषाणु एवं सूक्ष्मजीवियों आदि अनेक परजीवियों

का सामना करना पड़ता है। यदि प्राणी में संक्रमण कम होता है तो वह परजीवी के आक्रमण से प्रतिरक्षित (Immune) हो सकता है। किसी आक्रमणकारी ऐण्टिजन (Antigen) के विरुद्ध प्रतिक्रिया में शरीर की विभिन्न कोशिकाओं, कारक तथा अभिक्रियाओं की श्रृंखला को मिलाकर एक इम्यून तंत्र (Immune system) कार्य करता है। इस इम्यून तंत्र की उत्पत्ति दो महीने की भ्रूण में ही हो जाती है।

शरीर के इम्यून तंत्र के निर्माण में निम्नलिखित कोशिकाएँ सम्मिलित होती हैं (A) इम्यूनतंत्री सक्षम कोशिकाएँ (Immunologically competent cells)-इसके अंतर्गत (a) लिम्फो साइट्स – इसमें T एवं B कोशिकाएँ आती हैं तथा (b) प्लाज्मा कोशिकाएँ आती हैं।

(B) सहायक कोशिकाएँ (Accessory cells) या मैक्रोफेजेस (Macrophages)। (A) इम्यूनतंत्री सक्षम कोशिकाएँ-ये वे कोशिकाएँ होती हैं, जो कि किसी इम्यून प्रतिक्रिया में सीधे सम्मिलित रहती हैं। इसमें दो प्रकार की कोशिकाएँ आती हैं

(a) लिम्फोसाइट्स (Lymphocytes) अस्थि मज्जा में उत्पन्न होने वाली प्रोमोर्डियल कोशिकाएँ जिन्हें स्टेम कोशिकाएँ (Stem cells) भी कहते हैं, लिम्फोसाइट्स का निर्माण करती हैं। लिम्फोसाइट्स तथा लिम्फॉइड तंत्र में घूमती रहती हैं। ये बड़ी एकनाभिकीय कोशिकाएँ हैं, जो कि कुल ल्यूकोसाइट्स का 20- 30% तक होती है। परिधीय रक्त में 92% लिम्फोसाइट्स छोटे तथा 8% बड़े आकार के होते हैं। लिम्फोसाइट कोशिकाएँ दो प्रकार की होती हैं- (i) T-लिम्फोसाइट्स एवं (ii) B-लिम्फोसाइट।

(i) T-लिम्फोसाइट- यह भ्रूणीय अवस्था में अस्थि मज्जा में निर्मित होता है। अपरिपक्व कोशिकाएँ

थायमस ग्रंथि में पहुंचकर परिपक्व होती हैं, जो कि परिपक्व होकर थायमस ग्रंथि से रक्त परिवहन द्वारा अन्य लिम्फॉइड अंगों जैसे–लिम्फनोड, प्लीहा, टॉन्सिल आदि में पहुँच जाते हैं। जहाँ पर ये सक्रिय होकर ऐण्टिबॉडीज का निर्माण करते हैं। T- लिम्फोसाइट रुधिर तंत्र एवं लिम्फॉइड तंत्रों के बीच गति करते रहते हैं। आकार के आधार पर 1 लिम्फोसाइट्स दो प्रकार के होते हैं 1. सूक्ष्म लिम्फोसाइट (Micro lymphocyte) ये लाल रक्त कणों से थोड़े बड़े होते हैं। इनका केन्द्रक थोड़ा बढ़ा एवं दतिदार होता है और कोशिका का अधिकांश भाग घेरे रहता है। कोशिकाद्रव्य केन्द्रक के चारों ओर फैली हुई एक बेसोफिलिक होती है। बच्चों में इसकी मात्रा 50% होती है तथा उम्र के साथ यह कम होती जाती है और 10 वर्ष की आयु में केवल 35% रह जाती है।

  1. दीर्घ लिम्फोसाइट (Macro lymphocyte) इनका केन्द्रक गोलाकार, अण्डाकार या वृक्क जैसा होता है। कोशिकाद्रव्य कणिकाविहीन होता है। ये बच्चों में अधिक संख्या में तथा वयस्क में 48% तक पाये जाते हैं। कार्यों के आधार पर T-लिम्फोसाइट्स को तीन समूहों में बाँटा जा सकता है (1) किलर T-लिम्फोसाइट्स (Killer T-Lymphocytes) ये सोधे ऐण्टिजन पर आक्रमण करते हैं

और पोषक की संक्रमित कोशिकाओं को ही नष्ट कर देते हैं। इनको सतह पर विशिष्ट प्रोटीन T-कोशिका ग्राही (T-cell receptor) होती है। यह बाहरी कोशिकाओं को पहचान कर उन्हें मार देती है। (2) सहायक T- लिम्फोसाइट्स (Helper T-lymphocytes)- ये ऐण्टिजन से बंधकर ऐण्टीबॉडीज

का उत्पादन करने वाली अन्य कोशिकाओं, जैसे- B-कोशिकाओं एवं T-कोशिकाओं की सहायता करती हैं। (3) सप्रेसर T-लिम्फोसाइट (Suppressor T-lymphocyte) आवश्यकता अनुसार ये B तथा T कोशिकाओं के सामान्य कार्य को अवरोधित करती है तथा इम्यून प्रतिक्रिया को रोकती हैं। जैसे-AIDS के रोगियों में सहायक T-लिम्फोसाइट की कमी तथा सप्रेसर T-लिम्फोसाइट की अधिक संख्या पाई जाती है। फलस्वरूप ये इम्यून तंत्र को सप्रेस करते हैं।

(ii) B-लिम्फोसाइट – इन कोशिकाओं का भी निर्माण अस्थि मज्जा में होता है और परिपक्व भी अस्थि मज्जा में ही होता है। सर्वप्रथम इनका अध्ययन पत्तियों में किया गया था। परिपक्वन पश्चात् ये कोशिकाएँ लिम्फॉइड अंगों में पहुँच जाती हैं। B-लिम्फो साइट्स ऐण्टिबॉडीज का संश्लेषण करती हैं, जो कि अवांछित ऐण्टिजन का स्कंदन (agluti (nation) करती हैं। इसके साथ ही ये विशिष्ट प्लाज्मा कोशिकाओं में भी विभेदित होती हैं, जो जरूरत पड़ने पर भारी मात्रा में ऐण्टिबॉडीज का ।

निर्माण करती हैं। B तथा T लिम्फोसाइट का आकार एक समान होता है, परन्तु सतह पर पाये जाने वाले प्रोटीन अलग-अलग होते हैं। B- कोशिकाओं पर सतह ऐण्टिबॉडी तथा B-220 जैसे प्रोटीन होते हैं। इसी तरह से I सतह पर T-कोशिका ग्राही तथा Thy-1 प्रोटीन पाये जाते हैं।

3 . पेरामिशीयम की सामान्य संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए

उत्तर- – पैरामीशियम (Paramecium ) –

वर्गीकरण (Classification)

संघ (Phylum) – प्रोटोजोआ (Protozoa)

उप संघ (Sub-phylum) – सीलियोफोरा (Ciliophora)

वर्ग (Class) – सीलियेटा (Ciliata)

उपवर्ग (Sub-class) – .होलोट्राइका (Holotricha)

गण (Order) – ट्राइकोस्टोमेटी (Trichostomate)

वंश (Genus) – पैरामीशियम (Paramecium)

लक्षण (Characters)— 1. इसकी संरचना चप्पल के आकार की (Slipper shaped) होती है।

2. इसका अगला सिरा गोल एवं पिछला सिरा नुकीला होता है।

3. शरीर पैलिकल (Pellicle) से ढँका रहता है जिसके चारों ओर सिलिया (Cilia) पाया जाता है।

4. इसका पोषण होलोजोइक है।

5. पूरा शरीर बाहरी एक्टोप्लाज्म एवं भीतरी एण्डोप्लाज्म में बँटा रहता है।

6. एक्टोप्लाज्म में पेशी तन्तु मायोनिम्स एवं ट्राइकोसिस्ट पाई जाती है।

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